Friday, June 21, 2024

जब कर्ण ने परशुराम के सत्य को निर्वस्त्र कर दिया।

हिंसा।प्रतिहिंसा और प्रतिशोध की आग में जलने का नाम है परशुराम।परशुराम कोई व्यक्ति नहीं एक हिंसक विचार है।प्रतिशोध की अग्नि है।इस आग ने उनके विवेक और संवेदना को भी नष्ट कर दिया था । अचरज है रक्त पिपासु, हिंसा पर आधारित यह काठवत् विचारधारा मानवता के सामंजस्यकारी मूल्यों को चुनौती देती है।और यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि क्या व्यक्ति केवल चरम हिंसा के बूते भी जन-नायक के रूप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता हैं ? 

परशुराम का शाब्दिक अर्थ है ‘कुल्हाड़ी वाले राम’। उन्हें भार्गव राम या ‘पुरोहित भृगु कबीले का राम’ भी कहा जाता है, जो उन्हें राघव राम या ‘शाही रघु कबीले के राम’ से अलग करता है। परशुराम ऋचीक के पौत्र और जमदग्नि के पुत्र थे।भृगुवंशी होने के कारण इन्हें भार्गव और जमदग्नि के पुत्र होने के कारण इन्हे जामदग्न्य भी कहा गया। इन्हें शिव से परशु मिला था। ये दुर्वासा की तरह अपने क्रोधी स्वभाव के लिए ख्यात रहें हैं। 

इनकी माता रेणुका थी जिनकी हत्या परशुराम ने पिता के आदेश पर की थी।प्रसन्न हो जब पिता ने वर मॉगने को कहा तो इन्होंने मॉं के पुनर्जीवन का वर मॉंगा। परशुराम विष्णु के आवेश अवतार माने जाते हैं।वे शंकर के परमभक्त थे।शंकर के धनुष को तोड़ने के कारण वे रामायण  में राम से लड़ गए।इनका मूल नाम राम था। लेकिन परशु धारण करने से राम- परशुराम के रूप में विख्यात हुए।

आज उनका जन्मदिन है। बैसाख शुक्ल तृतीया को वे पृथ्वी पर आए थे। अक्षय तृतीया सनातन धर्मियों का प्रमुख त्योहार है। इस दिन नर-नारायण, भगवान परशुराम और हयग्रीव जैसे अवतार हुए थे। कहते है इसी रोज त्रेतायुग की भी शुरूआत हुई थी।

बदले की आग मे जलने के कारण परशुराम के प्रति लोगों में एक हिंसक साधु की धारणा बन गयी। जो शायद उतनी सही न हो। क्यों कि परशुराम वेद और नीति में पारंगत थे। ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी उनका कोई सानी नहीं था। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त “शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र” भी लिखा। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया ,अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान भी चलाया।

उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में शिक्षा पायी। कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें कल्प के अंत तक तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।शायद इसीलिए, “अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांश्च विभीषण: ,कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:।”

अश्वत्थामा, हनुमान और विभीषण की भाँति परशुराम भी धरती पर जीवित सात चिरजीवी में से एक हैं। तभी तो परशुराम राम के काल में भी थे और कृष्ण के काल में भी उनके होने की चर्चा होती है। उन्हे कल्प के अंत तक धरती पर रहने का वरदान था। विष्णु के दशावतारों में एक परशुराम भी थे। उनके आक्रोश और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन करने की घटनाओं  ने उन्हे जातीय बैमनस्य की केंद्र बना दिया।पिता की आज्ञा से मॉं रेणुका का सिर धड़ से अलग करने के कारण वे क्रूरता के चरम पर दिखे।एक बार गणेशजी ने परशुराम को शिव दर्शन से रोक लिया तो, रुष्ट परशुराम ने उन पर अपने परशु से प्रहार कर दिया ।जिससे गणेश का एक दाँत टूट गया और वे एकदंत कहलाए।झूठ बोलने पर दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या भूल जाने का श्राप भी आपने ही दिया था। 

वैदिक काल में ऋषि, राजा और उसके राज्य के कल्याण और लाभ के लिए यज्ञ करते थे।बदले में राजा ऋषियों और पुजारियों को गाय उपहार में देकर उनकी आजीविका सुनिश्चित करते थे।कालांतर में राजाओं और उनके पुजारियों में ऐसा सहजीवी संबंध नहीं रहे। यह बदलाव राम के आने से पहले होता है। 

परशुराम की दादी सत्यवती, राजा गाधि की बेटी थीं।उनका विवाह परशुराम के दादा ऋचिका से हुआ था।परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि को हैहय वंश के राजा सहस्त्रबाहु से एक गाय प्राप्त हुई थी। राजा का पुत्र कृतार्जुन या कार्तवीर्य अर्जुन ने जमदग्नी से  गाय को वापस मांग लिया। जब जमदग्नि ने मना कर दिया, तो राजा ने  गाय को बलपूर्वक ले लिया।परशुराम ने कुल्हाड़ी उठाई और राजा को मौत के घाट उतार दिया। राजा के पुत्रों ने प्रतिशोध में जमदग्नि का सिर काट दिया। क्रोधित परशुराम ने राजा के पांच कुलों का वध किया।कुछ कहते हैं कि योद्धाओं की पांच पीढ़ियों के रक्त की पांच झीलें बन गईं। ये झीलें बाद में भर गईं और यहीं कुरुक्षेत्र का भयानक युद्धक्षेत्र बना।

ऐसा कहा जाता है कि परशुराम ने अपने रास्ते में आने वाले हर क्षत्रिय को तब तक मारना जारी रखा जब तक कि पृथ्वी पर कोई और योद्धा नहीं बचा। परशुराम ने हैहय वंश के विनाश का संकल्प लिया। इस हेतु एक पूरी सामरिक रणनीति को अंजाम दिया।वाकचातुर्य और नेतृत्व दक्षता के बूते परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंषियों ने समर्थन दिया। रघुवंषी राजा दशरथ और राजा जनक ने भी परशुराम को अपनी सेनाएं दीं। परशुराम किसी सत्ता के अधिपति नहीं थे, इसलिए सेनाएं और अस्त्र-शस्त्र उनके पास नहीं थे। इन्हीं राजाओं ने सेनाएं और हथियार परशुराम को दिए। तब कहीं जाकर महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।परशुराम प्रतिशोध और प्रतिहिंसा की आग में जीवन भर जलते रहे।रामायण मे उनका मुक़ाबला लक्ष्मण से और महाभारत में कर्ण से होता है। प्रसंग रोचक है। कर्ण ने उन्हें एक्सपोज़ किया। 

अंगराज कर्ण अपने समय के महान् योद्धा थे। सूतपुत्र होने के कारण बचपन में शिक्षा के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कर्ण को नामी आचार्यों के आश्रम में दाखिला नहीं मिला। उन्हें आर्यावर्त का महान् धनुर्धर बनना था।और उसी वक्त आचार्य परशुराम अपनी परंपरागत विद्या के लिए कोई सुपात्र ढूँढ़ रहे थे। परशुराम अपनी परंपरागत विद्या ‘ब्रह्म‍ास्त्र’ किसी ब्राह्म‍ण को ही देना चाहते थे। जब कर्ण को यह पता चला तो वह ब्राह्म‍ण कुमार बनकर परशुराम के महेंद्र पर्वत आश्रम जा पहुँचे।उनकी यह गोपनीय योजना किसी को पता नहीं थी। 

कर्ण को परशुराम से ‘ब्रह्म‍ास्त्र’ लेना था। वह परशुराम के आश्रम पहुँचे। अपना शिष्यत्व देने के लिए परशुराम ने उनकी कठिन परीक्षा ली। वह रोज कर्ण से वैदिक ऋचाओं को सुनते। उन्होंने कर्ण से पिता के बारे में पूछा। कर्ण ने कहा, “मैं नहीं जानता।” परशुराम ने पूछा, “और माँ?” कर्ण ने कहा, “वह भी नहीं हैं।” “कहाँ गईं?” आचार्य ने पूछा। कर्ण ने कहा, “हस्तिनापुर के राजभवन में कहीं खो गईं।” कर्ण ने नाटकीयता ओढ़ते हुए कहा, “उन दुष्टों ने उनकी हत्या कर दी।” आचार्य भीतर से किटकिटाए। “इस ब्रह्म‍हत्या का पाप हस्तिनापुर को भस्म कर देगा, वत्स!”

परशुराम आक्रोश में बोलते रहे, “जब तक क्षत्रियों का विनाश नहीं होगा, धरती पाप से मुक्त नहीं होगी। तुम एक भुक्तभोगी हो। तुम्हारी मातृ-गरिमा क्षत्रियों से पदाक्रांत हुई है। जातीय विक्षोभ में निरंतर सुलगते रहना तुम्हारे लिए स्वाभाविक है। तुम मातृहंता के विपक्ष में सर्वदा रहोगे। मुझे पूरा विश्वास है। यही स्थिति तुम्हें ज्ञान की पात्रता प्रदान कर रही है। मैं तुम्हें अवश्य ब्रह्म‍ास्त्र दूँगा।”

आचार्य बड़ी तेजी से उठे और कर्ण का हाथ पकड़कर चल पड़े। उनकी गति बता रही थी कि जिस वस्तु के लिए वे अनेक वर्षों से व्याकुल थे, वह उन्हें आज अचानक मिल गई है।इस तरह कर्ण को परशुराम का शिष्यत्व प्राप्त हो गया। उन्हें विधिवत् दीक्षा दी गई। आश्रम के अन्य ब्रह्म‍चारियों ने कर्ण के भाग्य से ईर्ष्या करते हुए उसकी सराहना की। उन्हें आचार्य परशुराम ने अपने बगल की कुटिया रहने के लिए दी। पहले कर्ण को उन अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया गया, जिसके संचालन में मंत्रों की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसके बाद मंत्रों की शिक्षा का क्रम था। प्रात:काल यज्ञ और पूजन के बाद रोज ही आचार्य कर्ण को अपने अमूल्य प्रशिक्षण से गौरवान्वित करते। आचार्य ने अपनी सारी विद्या एक-एक कर कर्ण को देनी शुरू की। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वह आचार्य के करीब आते गए। कुषाण, पाश, कुठार, असि, त्रिशूल, शब्दभेदी सबकी शिक्षा परशुराम ने कर्ण को दी।

कर्ण बड़ी आस्था के साथ आचार्य की सेवा में लग गए। आचार्य परशुराम अपना सारा ज्ञान उड़ेलते गए। एक शाम वह बड़ी आत्मीयता से बोले, “वत्स, जो कुछ मेरे पास था, वह सब कुछ मैंने तुझे दे दिया, केवल एक वस्तु अभी तक नहीं दे पाया।” फिर उन्होंने कर्ण की आँखों में झाँककर जैसे कुछ टटोला, “वह मैं दे नहीं सकूँगा। उसे तुम्हें स्वयं लेना पड़ेगा।” कर्ण समझ गए कि आचार्य अपने प्रतिशोध के बाबत कर रहे हैं। कर्ण ने कहा, “जिस ओर आपने अनेक बार संकेत किया है, उस वस्तु को मैंने पहले ही दिन आश्रम में प्रवेश करते ही ग्रहण कर लिया था।” यह सुन आचार्य की आकृति की प्रत्येक झुर्री संतोष का स्वर अलापने लगी। कुछ दिनों बाद परशुराम बीमार पड़े। अपनी कुटिया के बाहर आचार्य लेटे थे।

कर्ण आचार्य का सिर अपनी जाँघ पर रखकर दबाने लगे। धीरे-धीरे उनकी आँख लग गई। वे सो गए। इसी बीच कर्ण की जाँघ के नीचे पता नहीं किधर से एक कीड़ा पहुँच गया। वह कर्ण को काटने लगा। जोर की पीड़ा हुई, पर कर्ण आचार्य की नींद के कारण जरा भी टस-से-मस नहीं हुए। कीड़ा काटता गया। आचार्यजी चैन से सो रहे थे। कर्ण को अनुभव हुआ कि वह कीड़ा काटता हुआ उनकी जाँघ में घुसता चला जा रहा है। फिर भी वह नहीं हिले। यकायक आचार्य की नींद खुल गई। उन्होंने हड़बड़ाकर अपना दाहिना हाथ बाईं ओर पीठ के नीचे डाला। एक चिपचिपे गरम पद्धार्थ का उन्हें अहसास हुआ। हाथ निकालकर देखा तो वह खून था।

“यह क्या?” कहते हुए आचार्य परशुराम उठ बैठे।

कर्ण ने कहा, “यह रक्त मेरी जाँघ का है।”

“तुम्हारी जाँघ का?” आचार्य की मुखमुद्रा एकदम बदल गई।

“काटता हुआ कीड़ा जाँघ में घुस गया और तू टस-से-मस नहीं हुआ?”

“मुझे आपकी निद्रा भंग होने का भय था।”

“मात्र इतने भय के कारण तूने मर्मभेदक वेदना सहन कर ली!” उनका यह अप्रत्याशित परिवर्तन देखने लायक था।

“तब तू निश्चित ही क्षत्रिय है। क्षत्रियों के अतिरिक्त ब्राह्म‍णों में इतना धैर्य नहीं हो सकता। अंग कटता चला जाए और ब्राह्म‍ण चुप रहे, यह कभी नहीं हो सकता है, कभी नहीं। यह उसकी प्रकृति के विरुद्ध है। उसके स्वभाव के विरुद्ध है। अवश्य ही तू क्षत्रिय है। तूने मुझे धोखा दिया है।” आचार्य परशुराम का आचार्यत्व कुपित होकर फुफकारने लगा।

कर्ण असमंजस में पड़ गया। अब क्या कहे। उसने सोचा, पता है तू क्या है? जब तुझे स्वयं पता नहीं है कि तू क्या है तब तू क्यों नहीं शपथ लेता कि मैं क्षत्रिय नहीं हूँ। अब वह मुखर हुआ, “मैं क्षत्रिय नहीं हूँ आचार्य। विश्वास मानिए, मैं क्षत्रिय नहीं हूँ।”

“तू झूठ बोलता है।”

“मैं सत्य कहता हूँ।” कर्ण ने आकाश की ओर हाथ उठाया, “भगवान् भास्कर की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं क्षत्रिय नहीं हूँ।”

“तू क्षत्रिय नहीं है, तो तू छलिया है। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। तू एक तपस्वी ब्राह्म‍ण के सामने झूठ बोल रहा है। अब तक तो तेरा अहित नहीं हुआ है, लेकिन अब अवश्य होगा।”

शापित होने के भय से कर्ण आचार्य के चरणों पर गिर गया और अपनी असलियत बताई। वे भभक उठे, “नराधम! तुमने घोर अपराध किया है। मेरे समस्त स्वप्न खंडित हो गए। मैंने सोचा था कि तुम जैसा योग्य शिष्य पाकर मैं अब शांति से जी सकूँगा, किंतु जीना तो दूर, अब शांति से मर भी नहीं सकता। जीवन भर मेरी प्रतिहिंसा मुझे चुभती रही। अंत तक चुभती रह जाएगी।” अपना सिर पीटकर वे बोलते गए, “पापी, तूने कैसा मुझ पर जादू कर दिया था। तेरी सेवा और विनयभाव ने मुझे ऐसा मोह लिया था कि मैं असलियत नहीं पहचान सका। मैं क्यों धोखा खा गया?” वे सचमुच बिलखने लगे। उनके टूटे सपने आँखों से बहने लगे।कर्ण ने उन्हें सांत्वना दी, “आप इतने व्याकुल न हों, गुरुदेव! जरा सोचें तो, जिसके आदि का पता नहीं, क्या वह ब्राह्म‍ण नहीं हो सकता?”

“वह सब कुछ हो सकता है, लेकिन ब्राह्म‍ण नहीं हो सकता। विश्वास कर, उसमें वेदना सहने की इतनी शक्ति नहीं होती।” आचार्य परशुराम पर क्रोध की दूसरी लहर आई, “आखिर किस लोभ में तुमने मेरा ब्रह्म‍ास्त्र चुराया? चोर, दस्यु, लुटेरा, बोलता क्यों नहीं?”

“शत्रुओं को पराजित करने के लिए।” कर्ण के मुँह से अनायास निकल पड़ा।

“जा जिस शत्रु को पराजित करने के लिए तूने मेरी इतनी सेवा की, अभ्यास और साधना की, वह एक भी तेरे काम नहीं आएगी। तू अवसर पर ब्रह्म‍ास्त्र का प्रयोग ही भूल जाएगा।” इतना कहकर उन्होंने हाथ में जल लिया। उनके अश्रुपूरित नेत्र मुँदे। अधर पर कंपन हुआ और फिर वे पागलों सा चीखे, “देख, वह भस्म हो गया। भस्म हो गई तेरी साधना, भस्म हो गई तेरी तपस्या और भस्म हो गया तेरा ब्रह्म‍ास्त्र।”

भय की चरम सीमा पर मनुष्य निर्भय हो जाता है। कर्ण हंसने लगा और बोला-“ आप मेरी तपस्या को भस्म कर सकते हैं पर आप अपनी प्रतिशोध भावना को भस्म नहीं कर सकते। कितनी विवशता है आपकी। एक अग्नि जो आपके पूर्वजों को राखकर गई, जिसमें आज तिल तिल कर सुलग रहे हैं, आप उसे शांत नहीं कर सकते। “

“कैसे शांत कर सकता हूं, यही अग्नि तो मुझे उत्तराधिकार में मिली है। “

इस बार की कर्ण की हंसी पहले से तेज थी, ”उत्तराधिकार में मिला वैरभाव और राजा का कोप अधिक नहीं पालना चाहिए। उसे पाप की गठरी की तरह उतारकर फेंक देना चाहिए। शापित होने पर भी मैं आपका शिष्य हूं। मैं आपके अधिक मुंह लगकर दुर्विनीत होना नहीं चाहता। बस इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिहिंसा की अग्नि-शय्या पर जलते रहने से कहीं अच्छा है सद्भावना की गोद में शांतिपूर्वक सोना।“

कर्ण के असामान्य व्यवहार से उनकी मुखमुद्रा भी बदली। वह पहले की अपेक्षा कुछ सामान्य होते हुए बोले- “मैं कैसे सद्भावना की बात सोचूं जबकि हमारे पूवर्जों ने ऐसा नहीं किया?”

“ तो उन्होंने गलती की। आप भी उसी गलती को दोहराइए, क्या यह ठीक है?”

“अब मैं देखता हूं कि तू मेरे पूवर्जों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है, सीमा से बाहर जा रहा है “

“ मैं सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहा हूं गुरुदेव। वरन एक शाश्वत सत्य की ओर इंगित कर रहा हूँ “

“ सत्य तो यही है कि मेरे पूवर्जों ने इक्कीस बार धरती को क्षत्रियविहीन किया था और मैं….”

वह अपना वाक्य पूरा करते इससे पहले कर्ण ने कहा- “ कोई ब्रह्मास्त्र न तो प्रकृति को पराजित कर सकता है न नियति को क्योंकि प्रकृति अपनी सृष्टि की सुरक्षा स्वयं करती है। आप इक्कीस बार नहीं इक्कीस सहस्र बार क्षत्रियों का विनाश कर दीजिए पर प्रकृति उसका बीज सुरक्षित रखेगी और वे जन्म लेते रहेंगे।”

“ मैं तुझसे उपदेश नहीं सुनना चाहता दुष्ट, तू मेरी आंखों से ओझल हो जा। “

“ यदि आपका आक्रोश मेरे विवेक को ठुकरा सकता है तो मैं भी आपके शाप की परवाह नहीं करता।” आचार्य के समक्ष कर्ण का अहं अपने स्वाभाविक रूप में उतरा। उसने कहा- “आप और आपके सभी पूर्वज अपने ही प्रतिशोध से शापित थे और मैं, वह भी मैं नहीं बल्कि आपका दिया हुआ ब्रह्मास्त्र स्वयं आपसे शापित हुआ। तो क्या हुआ, मुझे इसकी जरा भी चिंता नही है। मैं तो प्रतिहिंसा की उस विशाल छाया को देख रहा हूं आचार्य जिसकी लौह प्राचीरों के भीतर आपकी और आपके पूर्वजों की संपूर्ण मनीषा बंदी होकर कुंठित हो गई है। मेरे शाप के चारों ओर तो कोई दीवार नहीं है। मैं तो …”  इतना कहकर कर्ण हंसने लगा- हा हा हा।

धीरे धीरे सभी ब्रह्मचारी इकट्ठा हो गए। विचित्र दृष्य था। पर्णकुटी के बाहर रक्त की धारा अभी सूखी नहीं थी। आचार्य जी की पीठ खून से सनी  थी। कर्ण की जांघ से खून अब भी बह रहा था और वह अट्टहास कर रहा था- “मैं कुछ देकर नहीं बल्कि यहां से कुछ न कुछ लेकर ही जा रहा हूं। केवल ब्रह्मास्त्र ही तो नष्ट हुआ शेष तो मेरे पास है। “

आचार्य अवाक होकर कर्ण को देखते रहे। बाद में संयत होकर बोले- “शेष सब कुछ तो तुम कहीं और से भी पा सकते थे। “

“तो मैं समझ लेता हूं कि मैं आपके यहां नहीं कहीं और आया था।“ कर्ण ने कहा। उसके बाद वह बोलता गया-“ मैं लुटेरा हूं, मैं दस्यु हूं पर काल मेरी कर्तव्यनिष्ठा की निश्चित रूप से सराहना करेगा और आपकी प्रतिहिंसा के लिए उसके पास घृणा के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। “

आचार्य का कोप पुन: तमतमाया-“ मैं देख रहा हूं तुम अपनी परिधि से बाहर होते जा रहे हो।”

“ अपनी ही परिधि से नहीं आश्रम की परिधि से भी बाहर जा रहा हूं। क्योंकि मेरी आकांक्षाएं पूरी हो चुकी हैं। और आप अब भी प्रतिशोध और चिंता में घुल रहे हैं कि कोई ऐसा शिष्य मिले जो आपके प्रतिशोध का निर्वाह करे। अच्छा तो अब मैं चला।” चलते हुए कर्ण के मुख से निकला- “मनुष्य किसी और से नहीं अपने वैरभाव से ही मारा जाता है।”

कर्ण ने परशुराम के सत्य को निर्वस्त्र कर दिया था। एक महान तपस्वी अपने भीतर के प्रतिशोध की आग में अपनी तपोशक्ति का हवन करता रहा और बदले में वैर और नफरत की भीतर तक झुलसाने वाली आग से जूझता रहा।

उन्ही परशुराम का आज जन्म दिन है।उनकी विद्वता को प्रणाम। 

यह महज कथा है। इससे जातीय वैमनस्य न पाले। 

(हेमंत शर्मा हिंदी पत्रकारिता में रोचकता और बौद्धिकता का अदभुत संगम है।अगर इनको पढ़ने की लत लग गयी तो बाक़ी कई छूट जाएँगी।इनको पढ़ना हिंदीभाषियों को मिट्टी से जोड़े रखता हैं।फ़िलहाल TV9 चैनल में न्यूज़निर्देशक के रूप में कार्यरत हैं।)

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