Sunday, January 23, 2022

यहूदी, ईसाई और मुसलमान ज़रूर हैं पर दीपावली के दिए हर साल जलते हैं।

(ये लेख क़रीब एक हफ़्ते पुराना हो चला है। पर आज जब समाज में मानवता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, इसे दिए की तरह रोशन रखना हम सबका दायित्व है। विवेक शुक्ला की कलम हमें अपने ही खोए हुए हिस्से से फिर जोड़ती है।)

शाहजहां रोड से आप हुमायूं रोड में जैसे ही दाखिल होते हैं तो आपको सड़क के दायीं  तऱफ एक छोटी सी इमारत दिखाई देती है। इसके बाहर कुछ सुरक्षा कर्मी खड़े हैं। शाम का वक्त है और ये देख रहे हैं एक शख्स को इमारत के बाहर दीये जलाते हुए। इसके साथ इसके परिवार के कुछ बच्चे भी हैं। दरअसल यह इमारत एक पवित्र स्थान है। यह है राजधानी का एकमात्र जूदेह हयम सिनगॉग है। इसे आप यहुदियों का मंदिर भी कह सकते हैं। सारे उत्तर भारत में यहुदियां की यह एकमात्र सिनगॉग।

 इसके रेब्बी मालेकर दिवाली से पहले सिनगॉग के बाहर दीये जलाते हैं। हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने प्रकाशोत्सव पर दीये जलाए हैं। आज शाम को जब अंधेरा गहरा होने लगेगा तो वे दीये जलाकर प्रकाश करेंगे। महाराष्ट्र से संबंध ऱखने वाले एजिकिल आइजेक मालेकर कहते हैं कि भारत में रहकर मैं आलोक पर्व से कैसे दूर जा सकता हैं। हम यहूदी हैं,पर हैं तो इसी भारत के। मालेकर राजधानी में सरकार की तरफ से विभिन्न अवसरों पर आयोजित होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का स्थायी चेहरा हैं।



रेब्बी एजिकिल आइजेक मालेकर अपने ही दियों की रोशनी में। 

उधर,जूदेह हयम सिनगॉग से ढाई-तीन किलोमीटर कस्तूरबा गांधी मार्ग पर देश के हजारों-लाखों इमामों की विभिन्न मंचों पर नुमाइंदगी करने वाले इमाम हाउस और गोल मस्जिद में दिवाली पर चिराग जलाने की बहुत पुरानी रिवायत है। 

इसे मरहूम मौलाना जमील अहमद ने आरंभ करवाया था। वे फकीर थे। उनके पास सभी धर्मों के लोग आते थे और वे भी सबके पास जाते थे। वे खुद दिवाली से पहले गोल मस्जिद के बाहर चिराग जलाया करते थे। उनका साथ देते उनके पुत्र डॉ मौलाना उमेर इलियासी। मौलाना जमील अहमद के साल 2010 में निधन के बाद डॉ इलियासी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

 वे बंगाली मार्केट से खुद दीये खरीद कर ले आए हैं। वे कहते हैं कि दिवाली-ईद भारत के पर्व हैं। इन्हें सब मनाते हैं। दिवाली को किसी मजहब विशेष से ही जोड़कर देखना सही नहीं है। ये तो अंधकार से प्रकाश की तरफ लेकर जाने वाला त्योहार है। अंधकार व्यापक है, रोशनी की अपेक्षा। दिन के पीछे भी अंधेरा है रात का। दिन के आगे भी अंधेरा है रात का। वास्तव में दिवाली को संकुचित दायरे में बांधा नहीं जा सकता। दिवाली सबकी है।

 दिल्ली के एंग्लो इंडियन समाज के संरक्षक और इतिहासकार आर.वी. स्मिथ दीपावली से तीन-चार दिन पहले अपने घनिष्ठ मित्रों को दीये खरीदकर बांटा भी करते थे। वे अपने दि स्टेट्समैन के दफ्तर से मिन्टो रोड की कुल्हड़ बस्ती में जाकर दीये खरीदा करते थे। सब एंग्लो इंडियन  दीपावली पर घरों में दीये जलाते हैं। राजधानी में करीब एक हजार एंग्लो इंडियन हैं। घनघोर मिष्ठान प्रेमी स्मिथ कहते थे- “प्रकाश का उत्सव सिर्फ घरों के अंधेरे को ही दूर करने का नहीं। यह हमारे अंदर के अंधकार को प्रकाश में बदलने का पर्व है। अज्ञान और असत्य से मुक्ति का प्रतीक है प्रकाश। यह प्रकाश जीवन का प्रकाश है। दीपावली उसी का प्रतीक है।”

 हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह भी दिवाली के चिरागों से रोशन है (छवि लेख के साथ)। पूरे पाँच दोनों तक सजाई जाती हैं दीपमालाएं। यह परंपरा यहाँ सदियों से जारी है।

और उधर कनॉट प्लेस में चीनी मूल के भारतीय जार्ज च्यू अपने शो-रूम के बाहर छोटी और बड़ी दिवाली को दीये लगाने की तैयारी कर चुके हैं। उनके पिता च्यू यूएह सान ने साल 1937 में कनॉट प्लेस के एफ ब्लाक में शूज और लेदर के सामान का शो-रूम खोला था। जार्ज च्यू को याद नहीं कि कब उन्होंने अपने शो-रूम के बाहर दिवाली पर चिराग ना जलाए हों।

 कनॉट प्लेस में 1990 के दशक तक चीनी मूल के भारतीयों की सात-आठ शो-रूम थे। इन सब में दिवाली पर सेल लगती और दीए जलाए जाते थे। जार्ज च्यू एक बार कह रहे थे कि चीनी लोग लगभग नास्तिक होते हैं। पर भारत में बस गए चीनी दिवाली से दूर तो नहीं जा सकते।

(साभार नवभारत टाइम्ज़)। 

Vivek Shukla
Vivek Shukla closely follows South Asia, Business and Delhi.

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